‘राम मंदिर’ मुद्दे पर होगा’आम चुनाव’

– महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और जाति जनगणना आदि मुद्दे बाजू में रख दिए जाएंगे 

नागपुर :- बेशक, भाजपा और संघ परिवार की आस्था और अस्मिता श्रीराम में निहित रही है, लेकिन भाजपा प्रत्येक चुनाव घोषणा-पत्र में मंदिर निर्माण का वायदा देश के साथ साझा करती रही है. अब वह वायदा पूरा हो गया है. यदि अब उसे इसका श्रेय मिलता है, तो उसमें छद्म और छलावा नहीं आंक सकते. जाहिर है, आगामी आमचुनाव अब इसी राम मंदिर के मुद्दे पर होगा और देश की जनता भी जान चुकी हैकि इसी पर उसे वोट करना है. इस तरह महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और जाति जनगणना आदि मुद्दे बाजू में रख दिए जाएंगे और राम मंदिर को ही इस चुनाव का मुख्य मुद्दा सरकारी पक्ष बनाने जा रहा है, इसमे कोई दो राय हो नहीं सकती. इसी प्रकारप्राण-प्रतिष्ठा से 1-2 दिन पहले ही देश की जनता का मूड भांपने के लिए एक चर्चित सर्वे एजेंसी ने देशव्यापी सर्वे किया था. इसमें करीब 43 फीसदी लोगों ने प्रभु श्रीराम की प्राण-प्रतिष्ठा को ‘राष्ट्रोत्सव’ माना, जबकि 23 फीसदी ने इसे भाजपा-संघ की उपलब्धि करार दिया. देखा जाए, तो ये 66 फीसदी लोग एक ही दिशा में सोच रहे हैं. अधूरे मंदिर से यह समारोह करने से कोई फर्क नहीं पड़ता, यह सोचने और मानने वाले भी करीब 56 फीसदी लोग थे. इसी संदर्भ में 54 फीसदी की सोच यह है कि इस समारोह में शामिल न होकर विपक्ष ने राष्ट्रीय स्तर पर ‘गलती’ की है, क्योंकि प्रभु श्रीराम राष्ट्रीय नायक ही नहीं, बल्कि आराध्य हैं. आराध्य नायक से बहुत ऊपर होता है. ऐसे में स्पष्ट है आगामी आम चुनाव में राम सबसे अहम चुनावी मुद्दा होंगे. संघ परिवार ‘राम लहर’को बरकरार रखने के लिए व्यापक स्तर पर समर्थकों को राम मंदिर दर्शन के लिए अयोध्या लाता रहेगा और इसी परिप्रेक्ष्य में वोटों की फसल पकती रहेगी.

बहरहाल, सोमवार को तीनों लोक आनंदित हुए, चराचर में उत्साह और उल्लास हुआ, असीम आसमान तक हरेक मंजर आह्लादित हुआ. सनातन के ‘प्राण’ श्रीराम का प्राण-प्रतिष्ठा समारोहहुआ, तो अनेकानेक लोगों का भावुक होना स्वाभाविक है. भीतर आत्मा से सवाल उभरते हैं कि भारत के ‘प्राण’ की प्राण-प्रतिष्ठा की नौबत ही क्यों आई ? इस सवाल के साथ पुरानी स्मृतियां भी ताजा हो गई, जब एक-एक ‘रामशिला’ के साथ सवा रुपया भी देने का संकल्प निभाया जा रहा था. विहिप के मुताबिक, ऐसा करीब 68 करोड़ भारतीयों ने किया था. हम सौभाग्यशाली हैं कि शिला और पनपते आंदोलन के भी साक्षी बने और अब कमोबेश टीवी चैनल के जरिए प्राण-प्रतिष्ठा का अलौकिक-सा दौर भी देख रहे हैं. सवाल ये भी मौजू लगते हैं कि प्रधानमंत्री के तौर पर वीपी सिंह ने ‘राम मंदिर’ के लिए जगहदेने का वायदा किया था और तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव ने कथित बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण का ऐलान किया था. यहदीगर है कि राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक हालात के दबावों के कारण कोई भी प्रधानमंत्री मस्जिद को दोबारा खड़ा नहीं कर सका. हमने राम मंदिर आंदोलन के स्वतः स्फूर्त उभार और उफान को भी देखा. उस दौर में कितने किशोर, युवा और उम्रदराज भारतीय मारे गए, रिकॉर्ड भारत और उप्र सरकारों के किसी भी मंत्रालय में दर्ज नहीं किया गया. क्या इसे राजनीतिक निर्णय नहीं मानेंगे ? राम मंदिर के जरिए सांस्कृतिक पुनरोत्थान का पूरा आंदोलन भाजपा, विहिप और आरएसएस ने चलाया था और उसी का फल उन्हें मिले, तो आश्चर्य नहीं होगा.

– राजीव रंजन कुशवाहा

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