राम आग नहीं, ऊर्जा हैं – मोदी

– अब राम से राष्ट्र तक चेतना का विस्तार करना है

प्रधानमंत्री मोदी ने अयोध्या में श्रीराम की तुलनात्मक व्याख्याएं कीं कि राम आग नहीं, ऊर्जा हैं। राम विवाद नहीं, समाधान हैं। राम वर्तमान नहीं, अनंतकाल हैं। राम की प्राण-प्रतिष्ठा कालचक्र का नया उद्गम है। ऐसी कई तुलनाओं के बाद प्रधानमंत्री ने यह सवाल भी किया कि राम मंदिर तो बन गया, अब आगे क्या? उन्होंने जवाब-सा भी दिया कि राम से राष्ट्र तक चेतना का विस्तार करना है। ‘चेतना का विस्तार’ अत्यंत व्यापक और उपदेशी-सा कथन है। जो राम मंदिर को ‘सांप्रदायिक’ करार देते रहे हैं, वे आगे के अभियान मथुरा और काशी को ही मानेंगे। श्रीकृष्ण जन्मभूमि और ज्ञानवापी के विवाद अदालतों में हैं। उन्हें अदालतों के विचाराधीन ही रहने दिया जाए। अयोध्या विवाद पर सर्वोच्च अदालत के पांच न्यायाधीशों की पीठ ने जो ऐतिहासिक निर्णय दिया था, जिसकी बदौलत राम मंदिर में भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा की जा सकी, अब वह निर्णय निचली अदालतों के लिए आधार-बिंदु हो सकता है। उपासना स्थलों की यथास्थिति को लेकर 1991 में संसद ने जो कानून बनाया था, उसकी व्याख्या प्राचीन पूजा-स्थलों के संदर्भ में सर्वोच्च अदालत ने फिलहाल छोड़ दी है। बहरहाल प्रधानमंत्री ने भविष्य के अभियान सिर्फ मथुरा और काशी ही तय नहीं किए हैं, बल्कि वह राम मंदिर सरीखे लक्ष्यों के साथ विकास, बुनियादी ढांचे, जन-कल्याण और प्रौद्योगिकी को लेकर भी आगे बढऩा चाहते हैं।

उन्हें अनुभव है कि सिर्फ राम मंदिर की चुनावी रणनीति ही पर्याप्त नहीं है, लिहाजा अयोध्या से दिल्ली लौट कर उन्होंने एक करोड़ घरों की छत पर सौर-ऊर्जा का सिस्टम स्थापित करने वाली योजना की घोषणा की। अयोध्या का तो कायाकल्प हो चुका है। जो योजनाएं शेष हैं, उन पर कार्य लगातार जारी है। अयोध्या में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और जंक्शन के रूप में नया, विकसित रेलवे स्टेशन, सडक़ों और राजमार्गों का चौड़ीकरण और 50 से अधिक विश्वस्तरीय होटलों की निर्माण-प्रक्रिया नई अयोध्या के नूतन चेहरे हैं। करीब 50,000 करोड़ रुपए की योजनाएं निर्माणाधीन हैं। औद्योगिक संगठनों का आकलन है कि अयोध्या में बहुत जल्द ही एक लाख करोड़ रुपए का कारोबार होगा। प्रधानमंत्री के हालिया संबोधनों से यह भी स्पष्ट है कि इस बार आम चुनाव में उनका फोकस दक्षिण भारत पर भी रहेगा। वहां वह बेहतर प्रदर्शन करना चाहते हैं, लिहाजा राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा के लिए 11 दिनों का जो कठिन अनुष्ठान किया था, उस दौरान प्रधानमंत्री आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, केरल के राम मंदिरों में गए।

उनके विधि-विधान के अनुसार पूजा-पाठ किए और उनकी भाषाओं में ‘रामायण’ के पाठ भी सुने। इससे पहले प्रधानमंत्री ने दक्षिण भारत के राज्यों के लिए हजारों करोड़ रुपए की परियोजनाओं के शिलान्यास और उद्घाटन भी किए। दक्षिण भारत के इन राज्यों में भाजपा के चुनावी हासिल ‘शून्य’ रहे हैं। केरल, तमिलनाडु, आंध्र से भाजपा का एक भी सांसद चुनकर संसद तक नहीं जा पाया है। सवाल है कि राम मंदिर पर आधारित प्रधानमंत्री की रणनीति क्या और किस सीमा तक भाजपा को चुनावी लाभांश दिला सकती है? बेशक राम मंदिर ‘मोदी की गारंटी’ को सत्यापित करता है। हालांकि बुनियाद संविधान पीठ ने डाली, लेकिन प्रशासनिक और अन्य प्रबंध न किए जाते, तो अयोध्या का समारोह इतना विशाल और विविध न हो पाता। अयोध्या का समारोह भाजपा-संघ प्रायोजित ही था। अब यहां से एक नए किस्म का ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ शुरू होगा।

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